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एक और हिंदी दिवस.........


मेरा देश महान, हिंदी मेरी शान……...
एक और हिंदी दिवस ..............

१९४७ में हमारे देश को ब्रिटिश शासन से आज़ादी मिलने के बाद भी हमारे सामने चुनौतियों का पहाड़ था। उसमें से एक बड़ी चुनौती थी भारत की विविधता, इस विशाल देश के हर एक प्रान्त का रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, संस्कृति अपने आप में ही एक धरोहर है| किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित करने से पहले सभी प्रान्तों के प्रतिनिधित्व से विचार विमर्श करना अत्यंत अनिवार्य था| एक लंबी बहस और चर्चा के बाद १४ सितम्बर १९४९ को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि (हिंदी) को भारत के अधिकारिक भाषा के रूप में चुना, परंतु अंग्रेजी भाषा को भी कामकाजी उपयोग ले लिए स्वकृति मिल गयी| हर साल इस मौके पर कई कार्यक्रम न्यूज़ चेनल पर प्रसारित होते है| स्कूलों और कॉलेज में कई प्रतियोगिताएँ और सभाएं आयोजित होती है और परिचर्चा होती हैं, लेकिन फिर वही स्कूल और कॉलेज हिंदी बोलने वाले माता पिता और बच्चों को नीची नज़रों से देखते है| ज्यादातर लोग अंग्रेजी बोलने से अपने आप को गर्वित महसूस करते है, घर में पालतू जानवर से लेकर किराने की दुकान में भी हम अंग्रेजी बोलते है, जबकि होटल, दुकानों, सिनेमाघरों और कई सर्वजनिक जगह पर हम आसानी से हिंदी में बोलचाल कर सकते है|


आज हिंदी केवल नेताओं की भाषा बन कर रह गयी है| अंग्रेजी शिक्षा की होड़ ने हिंदी को पछाड़ दिया है| अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध जानकारी और सेवायों से हम इंकार नहीं कर सकते न हि किसी भाषा के जानने और उसके प्रयोग में दिक्कत है परंतु अपनी भाषा का सम्मान न करना और उसके प्रति हीन मनोभावना रखना गलत है| शिक्षा किसी भी भाषा में ली जाये उसका परिचय अपने विचार और व्यवहार से प्रतीत होता है| सरकार और शिक्षा व्यवस्था पर दोषारोप न करके या बहस का मुद्दा न बनाकर हम अपनी तरफ से छोटा सा प्रयास करें तो भी हम आने वाली पीढ़ियों को हिंदी के प्रति प्रोत्साहित कर सकते है|


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